आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि को लेकर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की टिप्पणी पर अकादमिक और वैज्ञानिक समुदाय ने कड़ी आपत्ति जताई है। 14,100 से अधिक शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने हस्ताक्षर कर लोकसभा अध्यक्ष से मामले का संज्ञान लेने और संबंधित सांसद से टिप्पणी वापस लेने की मांग की है।

नई दिल्ली (Naren Danu) : कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर से आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि को लेकर लोकसभा में की गई टिप्पणी अब राजनीतिक दायरे से निकलकर अकादमिक जगत तक पहुंच गई है। देशभर के 14,100 से अधिक शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष से हस्तक्षेप की मांग की है।

‘साइंस एंड एकेडमिक कम्युनिटी’ की ओर से प्रो. राजीव सिंह द्वारा भेजी गई याचिका में कहा गया है कि संसद में परीक्षा सुधारों पर चर्चा के दौरान प्रियंका गांधी ने प्रो. वी. कामकोटि के लिए कथित तौर पर ‘गौ मूत्र एक्सपर्ट’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और प्रमुख शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख के प्रति अपमानजनक टिप्पणी बताया गया है।

5 अगस्त 2026 को भेजी गई इस याचिका को कम समय में देशभर के शिक्षाविदों का व्यापक समर्थन मिला। हस्ताक्षर करने वालों में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति और पूर्व कुलपति, संस्थानों के निदेशक, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, शिक्षक और शिक्षा विशेषज्ञ शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं ने अपने पत्र में प्रो. कामकोटि के शैक्षणिक और वैज्ञानिक योगदान का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि उन्होंने कंप्यूटर साइंस, साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि किसी शिक्षाविद के खिलाफ संसद में की गई व्यक्तिगत टिप्पणी का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे पूरे वैज्ञानिक और अकादमिक समुदाय का मनोबल प्रभावित होता है।

याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य राजनीतिक बहस को सीमित करना नहीं है। उनका कहना है कि संसद में नीतियों और संस्थागत फैसलों पर गंभीर और तीखी बहस हो सकती है, लेकिन असहमति को व्यक्तिगत टिप्पणी या उपहास के बजाय तथ्यों और तर्कों के आधार पर रखा जाना चाहिए।

लोकसभा अध्यक्ष से याचिका में दो प्रमुख मांगें की गई हैं। पहली, अकादमिक समुदाय की ओर से उठाई गई चिंताओं का संज्ञान लिया जाए और दूसरी, संबंधित सांसद से टिप्पणी वापस लेने के साथ उस पर खेद व्यक्त करने का आग्रह किया जाए। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि इस मामले में स्पष्ट संदेश देने से संसद और देश के शैक्षणिक संस्थानों दोनों की गरिमा मजबूत होगी।