सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति की बिक्री के समय पूरी कीमत का भुगतान होना अनिवार्य नहीं है। यदि पक्षों की मंशा मालिकाना हक ट्रांसफर करने की थी और सेल डीड विधिवत रजिस्टर्ड है, तो बाकी रकम बकाया रहने से बिक्री अपने आप खत्म नहीं होती। विक्रेता का उपाय सेल डीड रद्द कराना नहीं, बल्कि बकाया राशि की कानूनी वसूली करना है।

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति की खरीद-बिक्री से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी संपत्ति की पूरी बिक्री कीमत (Sale Consideration) का भुगतान सेल डीड के समय ही होना जरूरी नहीं है। यदि पक्षों की मंशा संपत्ति का मालिकाना हक ट्रांसफर करने की थी और सेल डीड विधिवत निष्पादित व रजिस्टर्ड हो चुकी है, तो केवल कुछ रकम बकाया रहने के आधार पर उस सेल डीड को अमान्य या रद्द नहीं किया जा सकता। फैसला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 7 अगस्त को रजिया बेगम व अन्य बनाम नफीसा बेगम अब्दुल हमीद व अन्य मामले में दिया।

शीर्ष अदालत ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 54 का हवाला देते हुए कहा कि बिक्री की कीमत पूरी तरह चुकाई गई हो, भविष्य में देने का वादा किया गया हो या कुछ रकम देकर बाकी बाद में देने की सहमति हो—इन परिस्थितियों में भी बिक्री पूरी हो सकती है। अदालत ने कहा कि असली कसौटी यह है कि पक्षों की मंशा संपत्ति का स्वामित्व ट्रांसफर करने की थी या नहीं। इसका आकलन सेल डीड की शर्तों, पक्षों के व्यवहार और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से किया जाएगा। मामले में दो संपत्तियों की सेल डीड 10 मार्च 1975 को की गई थी। प्रत्येक संपत्ति की कीमत 7,000 रुपये तय हुई थी, जिसमें 2,500 रुपये का भुगतान किया गया था, जबकि 4,500 रुपये विक्रेता के विभिन्न सरकारी व वित्तीय संस्थानों के बकाया चुकाने के लिए खरीदार के पास रहने थे। बाद में खरीदार द्वारा बकाया दायित्व पूरा नहीं किए जाने पर विवाद पैदा हुआ और विक्रेता पक्ष ने दोनों सेल डीड रद्द कर खुद को संपत्ति का मालिक घोषित करने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने सेल डीड रद्द करने की मांग खारिज कर दी थी और प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। हालांकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने दूसरी अपील में सेल डीड को निष्प्रभावी मानते हुए विक्रेता पक्ष के हक में फैसला दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के निष्कर्ष बहाल कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि *रजिस्टर्ड सेल डीड के बाद बाकी बिक्री रकम का भुगतान नहीं होना अपने आप में बिक्री को खत्म नहीं करता।* ऐसी स्थिति में विक्रेता का कानूनी उपाय बकाया रकम की वसूली के लिए दावा करना है, न कि केवल भुगतान न होने के आधार पर सेल डीड को शून्य घोषित करवाना। अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ताओं को शेष रकम ब्याज सहित चुकानी होगी; वहीं संपत्ति के मौजूदा कब्जे में कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया।