अंबाला : देश के करोड़ों गरीब और जरूरतमंद परिवारों तक सरकारी राशन पहुंचाने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की सबसे महत्वपूर्ण जमीनी कड़ी माने जाने वाले राशन डिपो धारक आज खुद आर्थिक संकट से जूझने को मजबूर हैं। सरकारें खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए हर वर्ष बड़ी धनराशि खर्च कर रही हैं, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि इस पूरी व्यवस्था को गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाने वाले डिपो धारकों को उनकी मेहनत का उचित मेहनताना कब मिलेगा?
राशन डिपो धारक वर्षों से अपने कमीशन में सम्मानजनक बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि महंगाई के मौजूदा दौर में दुकान का किराया, बिजली बिल, इंटरनेट, श्रमिकों का वेतन, परिवहन, ई-पॉस मशीनों का रखरखाव और अन्य खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इसके बावजूद कई जगह कमीशन में वर्षों बाद महज 10 या 20 पैसे प्रति किलो जैसी मामूली बढ़ोतरी की जाती है।
कमीशन बढ़ा, लेकिन खर्च उससे कई गुना बढ़ गया
डिपो धारकों का कहना है कि राशन वितरण का काम अब पहले की तुलना में कहीं अधिक तकनीकी और जिम्मेदारी वाला हो गया है। ई-पॉस मशीन, ऑनलाइन रिकॉर्ड, स्टॉक का हिसाब, लाभार्थियों का सत्यापन और नियमित वितरण जैसी जिम्मेदारियां डिपो धारकों को निभानी पड़ती हैं।
इसके बावजूद कमीशन का निर्धारण वास्तविक खर्चों और महंगाई के अनुरूप नहीं किया गया है। डिपो धारकों का तर्क है कि यदि सरकार चाहती है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली पारदर्शी और प्रभावी तरीके से चले, तो इस व्यवस्था के संचालकों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना भी जरूरी है।
80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों तक पहुंचता है राशन
देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से करोड़ों लाभार्थियों तक खाद्यान्न पहुंचाया जाता है। राशन डिपो धारक इस पूरी व्यवस्था को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका काम केवल अनाज बांटना नहीं, बल्कि स्टॉक संभालना, रिकॉर्ड बनाए रखना, मशीनों का संचालन और लाभार्थियों को समय पर राशन उपलब्ध कराना भी है।
डिपो धारकों का कहना है कि सरकार की खाद्य सुरक्षा योजनाओं की सफलता का श्रेय केवल नीतियों को नहीं, बल्कि उन हजारों-लाखों लोगों को भी मिलना चाहिए जो कठिन परिस्थितियों में जमीन पर इन योजनाओं को लागू करते हैं।
सरकार से चार प्रमुख मांगें
डिपो धारकों की मांग है कि उनका कमीशन वर्तमान महंगाई और वास्तविक संचालन लागत के आधार पर तय किया जाए। साथ ही कमीशन में सम्मानजनक और नियमित बढ़ोतरी हो। किराया, बिजली, इंटरनेट, लेबर और मशीन रखरखाव जैसे खर्चों की उचित व्यवस्था हो। डिपो धारकों को समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाए।आर्थिक शोषण समाप्त कर उन्हें सम्मानजनक और टिकाऊ आय उपलब्ध कराई जाए।
अब सरकार के फैसले का इंतजार
डिपो धारकों का कहना है कि वे वर्षों से सरकार की खाद्य सुरक्षा योजनाओं को सफल बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं। ऐसे में उनकी मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि उचित मेहनताना और सम्मानजनक जीवन की है।
अब बड़ा सवाल यही है कि जो लोग देश के करोड़ों गरीब परिवारों का पेट भरने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं, उनके परिवारों के पेट की चिंता कब की जाएगी?
डिपो धारकों को उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकारें उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए कमीशन में व्यावहारिक बढ़ोतरी, संचालन खर्चों की भरपाई और समय पर भुगतान को लेकर जल्द ठोस निर्णय लेंगी।