लखनऊ में अधिवक्ता एवं वक्ता डॉ. रिजवान अहमद ने आरएसएस और भाजपा की रणनीति को लेकर वैचारिक बहस छेड़ी है। सोशल मीडिया वीडियो में उन्होंने दावा किया कि संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से बैठक में मुसलमानों को जोड़ने पर चर्चा हुई। रिजवान ने सुझाव दिया कि संगठन को पहले हिंदू, युवा और दलित समाज के बीच अपना आधार मजबूत करना चाहिए। उनके बयान ने राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है।

लखनऊ (Naren Danu) : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष और केंद्र में भाजपा के लंबे शासनकाल के बीच संगठन की वैचारिक दिशा और सामाजिक रणनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अधिवक्ता एवं वक्ता डॉ. रिजवान अहमद ने सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में आरएसएस-भाजपा की रणनीति पर अपने विचार रखते हुए कहा कि संगठन को नए सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने के साथ-साथ अपने पारंपरिक समर्थक आधार को मजबूत करने पर भी प्राथमिकता देनी चाहिए।

डॉ. रिजवान ने दावा किया कि हाल ही में उनकी आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ करीब सवा घंटे तक बैठक हुई, जिसमें मुसलमानों को संगठन से जोड़ने सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा कि हिंदुत्व की राजनीतिक और सामाजिक शक्ति को बनाए रखने के लिए हिंदू समाज, युवाओं और दलित समुदाय के बीच संगठनात्मक आधार को मजबूत करना जरूरी है।

'हिंदुत्व केवल चुनावी नारा नहीं'

डॉ. रिजवान ने कहा कि हिंदुत्व को केवल चुनावी रणनीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार यह करोड़ों लोगों की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्र चेतना से जुड़ा विषय है।

उन्होंने यह भी कहा कि दशकों से संगठन के साथ जुड़े लोगों की अपेक्षाओं और योगदान को नजरअंदाज करना किसी भी वैचारिक संगठन के लिए चुनौती बन सकता है।

भाजपा के हिंदू वोट आधार को लेकर किया दावा

वीडियो में भाजपा के चुनावी प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए डॉ. रिजवान ने दावा किया कि 2014 में भाजपा को करीब 45-47 प्रतिशत हिंदू समर्थन प्राप्त था और बाद के चुनावों में इसमें कमी आई।

उन्होंने कहा कि यदि भाजपा का हिंदू समर्थन बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंच जाए तो पार्टी की चुनावी स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है। उन्होंने 2024 के चुनाव परिणामों का उदाहरण देते हुए उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की सीटों से जुड़े अपने अनुमान भी सामने रखे।

हालांकि, उनके ये आंकड़े और अनुमान उनके व्यक्तिगत राजनीतिक विश्लेषण और दावे हैं, जिन्हें आधिकारिक चुनावी आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

'विरोधियों की स्वीकृति के पीछे न भागें'

डॉ. रिजवान ने भाजपा और संघ को सलाह देते हुए कहा कि ऐसे सामाजिक वर्गों से स्वीकृति हासिल करने पर अत्यधिक ऊर्जा खर्च नहीं करनी चाहिए, जिनसे वैचारिक समर्थन मिलने की संभावना कम है।

उन्होंने संगठन से अपने स्थायी समर्थक वर्ग को मजबूत करने, युवाओं में राष्ट्रवाद एवं सांस्कृतिक चेतना बढ़ाने और दलित समाज को संगठनात्मक एवं वैचारिक मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान देने पर जोर दिया।

उनका तर्क था कि नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए मूल सामाजिक आधार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

कश्मीर और सामाजिक स्वीकार्यता का भी उठाया मुद्दा

अपने वीडियो में डॉ. रिजवान ने जम्मू-कश्मीर, सेकुलर छवि और सामाजिक स्वीकार्यता से जुड़े मुद्दों पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी संगठन को अपनी वैचारिक पहचान बनाए रखते हुए सामाजिक विस्तार की रणनीति तैयार करनी चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के लिए बाहरी स्वीकृति की तुलना में अपने समर्थक वर्ग का विश्वास बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण है।

'मृगतृष्णा' के उदाहरण से समझाई रणनीति

डॉ. रिजवान ने भारतीय दर्शन के मृगतृष्णा के उदाहरण के जरिए अपनी बात समझाई। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हिरण दूर दिखाई देने वाली रेत को पानी समझकर उसके पीछे दौड़ता रहता है, उसी तरह कोई संगठन यदि लगातार ऐसे वर्गों की स्वीकृति पाने में लगा रहे जो उसके साथ आने के इच्छुक नहीं हैं, तो वह अपने मजबूत आधार को कमजोर कर सकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पेड़ की शाखाएं तभी हरी रहती हैं, जब उसकी जड़ों को पर्याप्त पोषण मिलता रहे। इसी तरह संगठन का विस्तार जरूरी है, लेकिन उसकी वैचारिक और सामाजिक जड़ों को मजबूत रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

'पूरे हिंदू समाज का समर्थन मिला तो भाजपा मजबूत होगी'

वीडियो के अंत में डॉ. रिजवान ने दावा किया कि यदि व्यापक हिंदू समाज भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा हो जाए तो पार्टी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हो सकती है।

उन्होंने संगठन के सामने एक व्यापक सवाल रखते हुए कहा कि उसे यह तय करना होगा कि वह नए वर्गों की स्वीकृति हासिल करने की कोशिश में अपने पारंपरिक समर्थकों की अपेक्षाओं को तो नजरअंदाज नहीं कर रहा। उनके अनुसार, हिंदुत्व की दीर्घकालीन शक्ति, संगठन की दिशा और राजनीतिक स्थिरता के लिए इस संतुलन पर विचार करना जरूरी है।

डॉ. रिजवान के इन बयानों ने सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में संघ-भाजपा की सामाजिक रणनीति, हिंदुत्व और चुनावी राजनीति के संबंध को लेकर बहस को एक नया कोण दे दिया है।