दिल्ली सरकार के 1.30 लाख MTB साइकिल खरीद टेंडर को लेकर विवाद बढ़ गया है। लुधियाना की SK Bikes, Avon Cycles और Hero EcoTech समेत कंपनियों ने टेंडर शर्तों पर आपत्ति जताई है। आरोप लगाया गया है कि नियमों से प्रतिस्पर्धा सीमित हुई। कंपनियों ने सीवीसी समेत कई अधिकारियों से शिकायत कर प्रक्रिया की जांच और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है।

नई दिल्ली : दिल्ली सरकार के करीब ₹90 करोड़ के साइकिल खरीद टेंडर ने अब केवल एक सरकारी खरीद का मामला नहीं, बल्कि देश के साइकिल उद्योग के भीतर चल रही कारोबारी प्रतिस्पर्धा, लॉबिंग और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को भी सामने ला दिया है। उद्योग से जुड़ी कई कंपनियां टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठा रही हैं, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक दल भी इस विवाद में कूद पड़े हैं।

मामला स्कूली छात्राओं के लिए 1.30 लाख माउंटेन टेरेन (MTB) साइकिलों की खरीद का है। आरोप है कि टेंडर की पात्रता शर्तें इस प्रकार तय की गईं कि सीमित कंपनियां ही दौड़ में रह सकें। लुधियाना की SK Bikes Private Limited, Avon Cycles Limited और Hero EcoTech Limited सहित कई कंपनियों ने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए शिक्षा विभाग, उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को शिकायतें भेजी हैं।

SK Bikes का दावा है कि वह समान स्पेसिफिकेशन वाली साइकिल करीब ₹4,100 प्रति यूनिट उपलब्ध करा सकती थी, जबकि चयनित दर ₹6,923 से ₹6,957 प्रति साइकिल रही। कंपनी का कहना है कि यदि उसे प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलता तो सरकारी खजाने के लगभग ₹36.7 करोड़ की बचत संभव थी।

शिकायतों में यह भी आरोप लगाया गया है कि ₹90 करोड़ के टेंडर के लिए ₹360 करोड़ का वार्षिक टर्नओवर अनिवार्य कर दिया गया, जिससे कई स्थापित निर्माता स्वतः बाहर हो गए। साथ ही नवीनतम वित्तीय वर्ष को पात्रता में शामिल न करने और प्री-बिड बैठक नहीं कराने पर भी सवाल उठाए गए हैं।

उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल एक टेंडर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी खरीद में पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और बड़े उद्योग समूहों के प्रभाव को लेकर गंभीर बहस छेड़ सकता है। उनका कहना है कि यदि टेंडर शर्तें वास्तव में प्रतिस्पर्धा को सीमित करने के उद्देश्य से बनाई गई हों, तो यह न केवल सरकारी धन के उपयोग बल्कि पूरे उद्योग में निष्पक्ष कारोबारी माहौल पर भी सवाल खड़े करता है।

आम आदमी पार्टी ने भी मामले में निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया है कि टेंडर की शर्तें पहले से तय कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गईं। हालांकि अब तक संबंधित विभाग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।