भूपेश बघेल की मौजूदगी में चन्नी समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन, जलालपुर प्रकरण के बाद बढ़ी खींचतान; राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कि क्या राजा वड़िंग सिर्फ मोहरा बन गए हैं और असली निशाना कांग्रेस हाईकमान के फैसले हैं। 2027 चुनाव से पहले पार्टी के भीतर गुटबाजी खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है।

लुधियाना (नवीन गोगना) : पिछले करीब डेढ़ महीने से पंजाब कांग्रेस के अंदर चल रहा कलह-क्लेश खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। पहले राउंड का चक्कर लगाकर दिल्ली पहुंचे पंजाब कांग्रेस मामलों के प्रभारी भूपेश बघेल की ओर से पंजाब के बाद दिल्ली में पंजाब के नाराज कांग्रेसियों की पार्टी हाईकमान के कुछ वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करवाना और इसके बाद यह बयान देना कि पार्टी में सब शांत है तथा पंजाब को लेकर हाईकमान ने जो फैसला सुनाया था, उसे बदला नहीं जाएगा—इससे पंजाब में यह संदेश गया कि जब पंजाब प्रभारी ने दिल्ली में बैठक के बाद मीडिया के सामने आकर खुद यह बात कह दी है तो अब राजा वड़िंग विरोधियों को अपने तेवर बदलने ही पड़ेंगे।

मगर जैसे ही बघेल ने पंजाब के अपने दूसरे राउंड की शुरुआत के पहले दिन मदन लाल जलालपुर को लेकर फैसला सुनाया, उस फैसले ने आग में घी डालने का काम कर दिया। जहां पहले वड़िंग विरोधी खेमे के बड़े नेता कुछ हद तक खुलकर बोलने से संकोच करते दिखाई दे रहे थे, वही चन्नी खेमा उसी दिन शाम को मदन लाल जलालपुर के घर जा बेठा ओर वहा मीडिया के मध्यम से यहा पंजाब ईकाई को यह जताया की जलालपुर को पार्टी से निकालना उनके अधिकार क्षेत्र मे नही वही पार्टी हाईकमान को जलालपुर के फेंसले पर पुनर्विचार करने की अपील की ओर अब वहीं पिछले दो-तीन दिनों से जिस प्रकार कार्यकर्ताओं की ओर से पंजाब कांग्रेस के कार्यक्रमों में राजा विरोधी नेताओं के पक्ष में नारेबाजी की जा रही है, उसे देखकर एक कहावत याद आ जाती है—

“बंदूक किसी की और गोली कोई और चला गया।”
भाव यह है कि राजा वड़िंग विरोधियों ने अपनी राजनीतिक चमड़ी बचाने और कांग्रेस हाईकमान को आंख दिखाने के लिए एक तीर से दो शिकार करने की चाल शुरू कर दी है।

इसकी एक ताजा उदाहरण आज देखने को मिली। जिस मंच पर पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग के साथ पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल भी मौजूद थे, उसी मंच के बिल्कुल सामने राजा विरोधी धड़े से जुड़े नौजवानों की ओर से “चन्नी जिंदाबाद” के नारे लगाए गए।

उनका हौसला इतना बुलंद दिखाई दिया कि राजा वड़िंग के बुलावे पर एक युवक मंच पर चढ़ गया और राजा के ही माइक पर “चन्नी जिंदाबाद, कांग्रेस जिंदाबाद” के नारे लगाता रहा।

इतना ही नहीं, राजा विरोधियों की ओर से “बघेल गो बैक” के पोस्टर भी उस इलाके में लगाए गए। यह पूरा घटनाक्रम भूपेश बघेल की मौजूदगी में हुआ और वह इसे चुपचाप देखते रहे।
लेकिन जो लोग राजनीति की बारीकियों को समझते हैं, वे इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदेश भी समझ गए होंगे कि क्या राजा वड़िंग विरोधी अब हाईकमान के साथ आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में आ गए हैं?
और क्या इस लड़ाई में राजा वड़िंग का कंधा केवल बंदूक रखने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि असली राजनीतिक गोली पार्टी के फैसले लेने वाली हाईकमान की छाती के आर-पार करने की तैयारी है?

राजा केवल मोहरा, असली निशाना हाईकमान?

अगर राजनीतिक तौर पर इस पूरे घटनाक्रम को समझने की कोशिश की जाए तो तस्वीर कुछ इस तरह बनती दिखाई देती है कि राजा वड़िंग विरोधियों को शायद अब यह मालूम हो गया है कि राजा के पीछे सीधे तौर पर कांग्रेस हाईकमान खड़ी है।

ऐसे में उन्हें यह भी समझ आ गया है कि अब लड़ाई केवल राजा वड़िंग तक सीमित नहीं रही, बल्कि यदि लड़ना है तो आर-पार की लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

लेकिन यहां सबसे बड़ी राजनीतिक मुश्किल यह है कि अगर राजा विरोधी पंजाब के बड़े नेता स्वयं खुलकर सामने आते हैं तो मामला सीधे पार्टी अनुशासन का बन सकता है। ऐसी स्थिति में पार्टी मदन लाल जलालपुर की तरह उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा सकती है।

यही कारण हो सकता है कि अब ऐसी रणनीति अपनाई जा रही हो जिसमें बड़े नेता खुद सामने आने के बजाय ऐसे लोगों और कार्यकर्ताओं को आगे करें, जिनका पार्टी ज्यादा कुछ बिगाड़ न पाए।
यदि पार्टी इस नारेबाजी या विरोध को लेकर ज्यादा हल्ला-गुल्ला करती है तो आसानी से यह कहा जा सकता है कि—
“ये कार्यकर्ताओं की भावनाएं हैं। हम कार्यकर्ताओं को नहीं रोक सकते। हमने तो कुछ कहा ही नहीं।”
यानी सीधे तौर पर दूध से मक्खी की तरह खुद को बाहर निकाल लिया जाए। दूध खराब होता है तो होता रहे—अर्थात पार्टी की स्थिति बिगड़ती है तो बिगड़ती रहे, लेकिन सीधे तौर पर किसी बड़े नेता पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार तैयार न हो।