नई दिल्ली (Naren Danu) : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को प्रकृति के संरक्षण और उसके सम्मान को मानवता के कल्याण से जोड़ते हुए भारतीय संस्कृति की पर्यावरणीय सोच को रेखांकित किया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक प्राचीन सुभाषितम् साझा करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना भारतीय परंपरा का मूल संदेश रहा है।
प्रधानमंत्री ने लिखा, “प्रकृति के संरक्षण और सम्मान में ही मानवता का कल्याण निहित है। हमारी परंपरा भी हमें इसी धर्मसम्मत आचरण की प्रेरणा देती है।” उन्होंने बताया कि भारत की प्राचीन संस्कृति हमेशा मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने की बात करती रही है।
अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक साझा किया—
“लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा।
ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥
दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा।
श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥”
इस सुभाषितम् का भावार्थ है कि प्रकृति, समय और धर्म के साथ तालमेल बनाकर जीवन व्यतीत करना ही सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग है। इसमें व्यक्ति के जीवन में सभी दिशाओं के रक्षक देवताओं, इंद्र सहित देवगणों, छह ऋतुओं, महीनों, दिनों और शुभ मुहूर्तों से मंगल और कल्याण की कामना की गई है।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश के माध्यम से यह भी रेखांकित किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण संरक्षण केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और कर्तव्यों का हिस्सा माना गया है। उन्होंने प्रकृति के प्रति सम्मान को आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जोड़ने का संदेश दिया।