इथेनॉल मिश्रित ईंधन से माइलेज घटने और खर्च बढ़ने का आरोप लगाते हुए टैक्सी व कमर्शियल वाहन यूनियनों ने केंद्र सरकार के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। यूनियनों का कहना है कि पुरानी पेट्रोल गाड़ियों के लिए E10 ईंधन जारी रखा जाए और प्रभावित वाहन मालिकों के लिए मुआवजे की व्यवस्था की जाए।

चंडीगढ़: पूरे देश में E20 पेट्रोल लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले का दिल्ली की टैक्सी और ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने विरोध किया है। उन्होंने 4 अगस्त को संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। उनका आरोप है कि इथेनॉल-मिश्रित ईंधन से उनकी गाड़ियों पर बुरा असर पड़ रहा है और चलाने का खर्च बढ़ रहा है।

इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व 'दिल्ली टैक्सी टूरिस्ट ट्रांसपोर्टर्स एसोसिएशन' कर रही है, जिसमें कई टैक्सी, ऑटो-रिक्शा और कमर्शियल वाहन यूनियनें भी शामिल हैं। उनका कहना है कि पुरानी पेट्रोल गाड़ियां, जो E20 ईंधन पर चलने के लिए नहीं बनी थीं, उनकी माइलेज कम हो रही है, इंजन से जुड़ी दिक्कतें आ रही हैं और मेंटेनेंस का खर्च बढ़ रहा है, जिससे ड्राइवरों पर इस नीति का आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

यूनियनों ने चेतावनी दी है कि इस प्रदर्शन में हजारों ड्राइवरों के शामिल होने की उम्मीद है और उन्होंने केंद्र सरकार से E20 को लागू करने के फैसले पर फिर से विचार करने की अपील की है। वे मांग कर रहे हैं कि पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल मिलता रहे, जिन गाड़ी मालिकों को नुकसान हुआ है उन्हें मुआवजा दिया जाए, और मौजूदा गाड़ियों पर E20 के असर की जांच के लिए एक स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन किया जाए।

हालांकि, केंद्र सरकार ने इस बदलाव का बचाव करते हुए कहा है कि E20 एक साफ़-सुथरा ईंधन है, जिससे कच्चे तेल का आयात कम होगा, कार्बन उत्सर्जन घटेगा और भारत के इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को बढ़ावा मिलेगा। सरकार का कहना है कि भारतीय सड़कों पर चल रही ज़्यादातर पेट्रोल गाड़ियां E20 के अनुकूल हैं और इंजन खराब होने की चिंताएं उपलब्ध तकनीकी अध्ययनों से साबित नहीं होती हैं।

ट्रांसपोर्ट यूनियनें इससे सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि कमर्शियल गाड़ियां, जो निजी कारों की तुलना में हर दिन कहीं ज़्यादा दूरी तय करती हैं, असल हालात में चलाने पर उनकी माइलेज और परफॉर्मेंस में साफ़ तौर पर गिरावट देखी जा रही है।

संसद का सत्र चल रहा है, ऐसे में 4 अगस्त के विरोध प्रदर्शन से यह मुद्दा राजनीतिक रूप से अहम हो सकता है। इससे सरकार के 'साफ़ ईंधन' एजेंडे के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है, क्योंकि ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर इस बदलाव से होने वाले अनचाहे खर्चों से राहत की मांग कर रहे हैं।