भोपाल (Naren Danu) : मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए गठित उच्च स्तरीय समिति ने अपना अंतिम प्रतिवेदन राज्य सरकार को सौंप दिया है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने की सिफारिश की है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार यदि कोई जोड़ा बिना पंजीकरण के लिव-इन संबंध में रहता है और इसकी जानकारी प्रशासन को मिलती है तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा।
समिति ने सोमवार देर शाम मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को यूसीसी का अंतिम प्रतिवेदन सौंपा। मुख्यमंत्री ने निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट प्रस्तुत करने पर समिति के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर समिति के सदस्य प्रो. गोपाल शर्मा, बुधपाल सिंह, शोभा पैठणकर और सदस्य सचिव अजय कटेसरिया उपस्थित रहे।
समिति की रिपोर्ट तीन खंडों में तैयार की गई है। पहले खंड में विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और राज्य की सामाजिक परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर अनुशंसाएं दी गई हैं। दूसरे खंड में प्रस्तावित विधेयक का प्रारूप शामिल है, जिसमें चार भाग, 404 धाराएं और सात अनुसूचियां हैं। तीसरे खंड में व्यापक जन-परामर्श का विवरण दिया गया है। समिति को जिला, राज्य और ऑनलाइन माध्यम से 9.58 लाख से अधिक सुझाव प्राप्त हुए, जिनका विस्तृत विश्लेषण रिपोर्ट में शामिल किया गया है।
प्रस्तावित यूसीसी में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन संबंधों के लिए समान प्रावधान सुझाए गए हैं। समिति ने लिव-इन संबंधों में रहने वाले जोड़ों के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने की सिफारिश की है। पंजीकरण के बाद इसकी सूचना संबंधित थाने और दोनों पक्षों के परिजनों को देने का भी प्रस्ताव है, ताकि संबंधों में पारदर्शिता बनी रहे। यदि लिव-इन संबंध समाप्त करना हो तो इसके लिए भी रजिस्ट्रार के समक्ष आवेदन देना होगा।
रिपोर्ट में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि लिव-इन संबंध से जन्म लेने वाले बच्चों को वैधानिक उत्तराधिकार के सभी अधिकार प्राप्त होंगे। साथ ही संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए भी स्पष्ट कानूनी व्यवस्था का सुझाव दिया गया है।
समिति ने अनुसूचित जनजातियों, घुमंतु एवं अर्द्धघुमंतु जनजातियों तथा मतांतरित आदिवासियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की अनुशंसा की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के सम्मान के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है।
राज्य सरकार ने रिपोर्ट विधि विभाग को सौंप दी है। आवश्यक कानूनी परीक्षण और वरिष्ठ सचिव समिति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रस्तावित विधेयक को मंत्रिपरिषद की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इसके बाद 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में इसे विधानसभा में पेश किए जाने की संभावना है। विधानसभा से पारित होने और राज्यपाल की मंजूरी के बाद विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। स्वीकृति मिलने के बाद नियम बनाकर इसे लागू किया जाएगा। यदि यह प्रक्रिया पूरी होती है तो मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का चौथा राज्य बन सकता है।