चंडीगढ़ (Naren Danu) : पंजाब में निजी स्कूलों द्वारा मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने पर अब प्रभावी अंकुश लग जाएगा। राज्यपाल ने "द पंजाब रेगुलेशन ऑफ फी ऑफ अनएडेड एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2026" को मंजूरी दे दी है। इसके लागू होने के बाद राज्य के निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल अब अपनी मर्जी से फीस में 5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि नहीं कर सकेंगे। राज्य सरकार ने इसे लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों के हित में बड़ा फैसला बताया है।
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने राज्यपाल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार लंबे समय से निजी स्कूलों द्वारा की जा रही मनमानी फीस वृद्धि की शिकायतों पर गंभीरता से काम कर रही थी। लगातार मिल रही शिकायतों में अभिभावकों ने बताया था कि हर वर्ष बिना किसी स्पष्ट आधार के फीस में भारी बढ़ोतरी की जा रही है, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा था। इसी समस्या के समाधान के लिए सरकार संशोधन अध्यादेश लेकर आई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नए अध्यादेश के लागू होने के बाद कोई भी निजी स्कूल निर्धारित सीमा से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकेगा। यदि किसी स्कूल को फीस में वृद्धि करनी होगी तो उसे तय नियमों के तहत ही ऐसा करना होगा और 5 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी की अनुमति नहीं होगी। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनने देगी और प्रत्येक बच्चे को सुलभ तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है।
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में कहा कि शिक्षा हर बच्चे का मौलिक अधिकार है और सरकार इस अधिकार की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि आम परिवारों की जेब पर पड़ने वाले अनावश्यक आर्थिक बोझ को कम करना सरकार की जिम्मेदारी है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए यह फैसला लिया गया है।
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, 9 जुलाई 2026 को राज्यपाल ने इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद 10 जुलाई को पंजाब राजभवन की ओर से मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को पत्र भेजकर इसकी जानकारी दी गई। साथ ही अध्यादेश की मूल हस्ताक्षरित प्रति और स्कूल शिक्षा विभाग से संबंधित फाइल आवश्यक कार्रवाई के लिए सरकार को लौटा दी गई।
राज्य सरकार का मानना है कि नए कानून से निजी स्कूलों की फीस निर्धारण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी और मनमानी पर प्रभावी नियंत्रण लगेगा। इससे लाखों अभिभावकों को आर्थिक राहत मिलेगी, जबकि शिक्षा व्यवस्था में संतुलन और जवाबदेही भी बढ़ेगी। सरकार का दावा है कि यह कदम शिक्षा क्षेत्र में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित होगा और विद्यार्थियों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।