नई दिल्ली (Narendra Signh Danu) : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद रविशंकर प्रसाद ने आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बताते हुए कहा कि 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल देशहित में नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता बचाने के लिए लागू किया गया था।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आपातकाल लागू होने के पीछे राजनीतिक कारण थे। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त किए जाने और सुप्रीम कोर्ट से पूर्ण राहत न मिलने के बाद सत्ता बचाने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को कुचलने का रास्ता अपनाया गया।
उन्होंने कहा कि आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देश को यह याद दिलाना जरूरी है कि उस दौर में लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं के साथ क्या हुआ था। प्रसाद ने स्वयं को जेपी आंदोलन का कार्यकर्ता बताते हुए कहा कि वे मीसा (MISA) के तहत जेल भी गए थे और उस दौर की घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं।
राजनीतिक बंदियों पर हुए अत्याचार
रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया कि आपातकाल के दौरान हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को जेलों में बंद कर प्रताड़ित किया गया। उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर की पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को बंदियों को कठिन परिस्थितियों में रखने के निर्देश दिए गए थे ताकि उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान किया जा सके।
उन्होंने कहा कि देशभर में लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज उठाने वालों को दबाने का प्रयास किया गया और कई राजनीतिक बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया।
जबरन नसबंदी को बताया मानवाधिकारों पर हमला
भाजपा नेता ने आपातकाल के दौरान चलाए गए नसबंदी अभियान को भी निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी कर्मचारियों पर नसबंदी के लक्ष्य पूरे करने का दबाव डाला गया था और पदोन्नति सहित कई प्रशासनिक लाभों को इससे जोड़ दिया गया था।
उनके अनुसार, कई स्थानों पर लोगों को जबरन नसबंदी के लिए मजबूर किया गया, यहां तक कि अविवाहित युवाओं को भी इस अभियान का शिकार बनाया गया। उन्होंने इसे मानवता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ गंभीर हमला बताया।
मीडिया पर सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचल दिया गया था। उन्होंने दावा किया कि 24 जून 1975 की रात दिल्ली के कई प्रमुख समाचार पत्रों के कार्यालयों की बिजली काट दी गई थी ताकि अखबार प्रकाशित न हो सकें।
उन्होंने कहा कि उस समय लागू सेंसरशिप के तहत समाचार प्रकाशित करने से पहले सरकारी मंजूरी लेना अनिवार्य था। सरकार ने समाचारों की सामग्री तक नियंत्रित की और सत्ता के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर सहित कई पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, जबकि कुछ समाचार पत्रों ने विरोधस्वरूप अपने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिए थे।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए इतिहास याद रखना जरूरी
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए देश को उस दौर से सबक लेने की आवश्यकता है।
भाजपा नेता ने कहा कि आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले हजारों लोकतंत्र सेनानियों के बलिदान और साहस को याद करना आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 50 वर्ष पहले था।