7,299 रुपये के लिए 19 साल तक अदालत का दरवाजा खटखटाती रही सरकार, हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

चंडीगढ़: मात्र 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद करीब 19 साल बाद आखिरकार समाप्त हो गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि यह मामला सुनवाई योग्य ही नहीं था।

यह मामला रोहतक के ओपी खन्ना से जुड़ा है, जिन्होंने दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच किए गए सरकारी दौरों के टीए बिलों के भुगतान के लिए मुकदमा दायर किया था। उनका आरोप था कि 7,299 रुपये के बिल बिना उचित कारण के रोक दिए गए और उन पर ब्याज भी दिया जाना चाहिए।

निचली अदालत से हाई कोर्ट तक लंबी कानूनी यात्रा

वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओपी खन्ना का दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद जिला अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए उनके पक्ष में निर्णय दिया।

इसी आदेश के खिलाफ हरियाणा सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दाखिल की, जिससे यह मामला वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझा रहा।

सरकार और याचिकाकर्ता के तर्क

सरकार की ओर से दलील दी गई कि टीए बिल बजट की कमी और नियमों पर उठी आपत्तियों के कारण रोके गए थे। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि भुगतान अनुचित रूप से लंबित रखा गया।

न्याय मित्र ने अदालत को बताया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील स्वीकार नहीं की जा सकती, इसलिए सरकार की याचिका ही अमान्य है।

हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

Punjab and Haryana High Court ने कहा कि यह मामला कानून की स्पष्ट सीमा के दायरे में आता है। न्यायालय ने माना कि विवादित राशि मात्र 7,299 रुपये है, जो वैधानिक सीमा से काफी कम है, इसलिए नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि छोटे वित्तीय मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी करना सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी है, क्योंकि कई बार विवादित राशि से अधिक खर्च केवल कानूनी प्रक्रिया पर हो जाता है।

फैसला

इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया और 19 साल पुराने इस विवाद पर अंतिम रूप से विराम लगा दिया।