"विस्थापित पंडितों के लिए विशेष पहचान की मांग"

जम्मू: आगामी जनगणना 2027 को लेकर विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय ने अलग पहचान और विशेष श्रेणी में दर्ज किए जाने की मांग उठाई है।

समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि 1990 के दशक में हुए पलायन के बाद वे आज भी विभिन्न राज्यों में रह रहे हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सही तरीके से दर्ज करने के लिए अलग पहचान आवश्यक है। उनका तर्क है कि इससे नीतियों और पुनर्वास योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

पनुन कश्मीर ने मांग की कि जनगणना रिकॉर्ड में प्रत्येक विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार और व्यक्ति के कश्मीर घाटी स्थित मूल निवास स्थान का उल्लेख किया जाए, ताकि समुदाय की जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक पहचान संरक्षित रह सके। ज्ञापन में विस्थापन की अवधि, पीढ़ीगत प्रभाव और कारणों को भी आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल करने की मांग की गई। संगठन ने कहा कि तीन दशक से अधिक समय का विस्थापन सामान्य प्रवास नहीं माना जा सकता और जनगणना में इस ऐतिहासिक वास्तविकता को सही रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल ने यह भी बताया कि पनुन कश्मीर द्वारा “पनुन कश्मीर जेनोसाइड एंड एट्रोसिटीज प्रिवेंशन बिल-2020” का प्रस्ताव पहले ही संसद सदस्यों और मंत्रिपरिषद के समक्ष रखा जा चुका है।