मुद्दे की बात : टैरिफ़ लागू, फिर भी भारत पर क्यों बरस रहे ट्रंप के सलाहकार ?

एक्सपोर्टरों को होगा नुकसान

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माहिरों की राय, चीन तो झुका नहीं, भारत को टारगेट कर लिया अमेरिका ने !

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। 50 फ़ीसदी अमेरिकी टैरिफ़ लागू होने के बाद भी अमेरिका के शीर्ष अधिकारी भारत के खिलाफ लगातार सख़्त बयान दे रहे हैं। जिस पर दुनिया के तमाम देश और आर्थिक मामलों के जानकार हैरानी जता रहे हैं।
मसलन, व्हाइट हाउस के आर्थिक सलाहकार केविन हैसेट ने भारत पर अपने बाज़ार ना खोलने का आरोप लगाते कहा, अगर भारतीय नहीं झुकते तो राष्ट्रपति ट्रंप भी नहीं झुकेंगे। बीबीसी की इस रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने तो रूस-यूक्रेन युद्ध को सीधे तौर पर मोदी का युद्ध करार देते दावा किया कि भारत सस्ता रूसी तेल ख़रीदकर इस युद्ध की फंडिंग में रूस की मदद कर रहा है।
वहीं, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी भारत के ख़िलाफ़ आर्थिक पेनल्टी लगाने का समर्थन किया। दूसरी ओर, भारत ने अमेरिकी टैरिफ़ को अनुचित और अव्यावहारिक बताते साफ़ कर दिया था कि वह अपने 140 करोड़ नागरिकों के हित में जहां से भी सस्ता तेल मिलेगा, ख़रीदना जारी रखेगा। भारत ने यह भी इशारा किया कि रूस से तेल लेने पर ऐसे टैरिफ़ ना तो चीन पर लगाए गए हैं और ना ही यूरोपीय संघ पर।
हैसेट के मुताबिक़, हम रूस पर ज़्यादा दबाव डालना चाहते हैं, ताकि शांति समझौता हो और लाखों जानें बचें। जबकि भारत हमारे उत्पादों के लिए अपना बाज़ार खोलने पर अड़ियल रुख़ रखे हुए है। भारत जो कर रहा है, उसकी वजह से अमेरिका में हर कोई नुकसान उठाता है। उपभोक्ता और कारोबार सब नुकसान में हैं और मज़दूर भी इसलिए नुकसान उठाते हैं। भारत के ऊंचे टैरिफ़ हमारी नौकरियां, कारखाने, कमाई और बेहतर वेतन के मौके कम कर देते हैं। टैक्स देने वालों को भी नुकसान होता है, क्योंकि हमें ‘मोदी के युद्ध’ के लिए पैसा देना पड़ता है। उन्होंने इस इंटरव्यू में आगे कहा, भारतीय इस मुद्दे पर बहुत अहंकारी हैं। वे कहते हैं कि हमारे यहां ऊंचे टैरिफ़ नहीं हैं। यह हमारी संप्रभुता है, हम जहां, जिससे चाहें तेल खरीद सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी थिंक टैंक द विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टिट्यूट के निदेशक माइकल कुगलमैन यूक्रेन युद्ध पर अलग राय रखते हैं। वह कहते हैं,मैं नहीं समझता कि किसी भी ग़ैर-पश्चिमी नेता ने यूक्रेन युद्ध का उतना साफ़ और बार-बार विरोध किया, जितना मोदी ने किया।
इस हफ्ते शुरू होने वाली व्यापार वार्ता रद होने के बावजूद, भारत के लिए रास्ता निकलने की उम्मीद बनी है। भारत अमेरिका का अहम रणनीतिक साझेदार है। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बयान, जिनमें भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों पर भरोसा जताया गया है, उसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। बेसेंट ने कहा, भारत ने ‘लिबरेशन डे’ के तुरंत बाद ही टैरिफ़ को लेकर बातचीत शुरू कर दी थी, लेकिन अब तक समझौता नहीं हुआ। वहीं,
बेसेंट की टिप्पणी के बीच भारत में वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि अमेरिका से बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई है। मंत्रालय उद्योग जगत से मिलकर टैरिफ़ के असर को कम करने के रास्ते तलाश रहा है। वहीं, भारतीय अधिकारियों का मानना है कि हालात उतने ख़राब नहीं होंगे, जितनी आशंका जताई जा रही है। भारत अपने निर्यात के लिए नए साझेदार देशों की ओर देख रहा है। ताकि अमेरिकी बाज़ार में संभावित गिरावट का असर घटाया जा सके।
अजय श्रीवास्तव दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के प्रमुख हैं। उनके मुताबिक मौजूदा बयानबाज़ी की जड़ें अमेरिका-चीन व्यापार टकराव में हैं। ट्रेड वॉर असल में अमेरिका और चीन के बीच थी। चीन ने साफ़ दिखा दिया कि सिर्फ़ ट्रेड रोककर अमेरिका, चीन को नीचे नहीं ला सकता। फिर अमेरिका को एक ‘फॉल गाय’ यानि बलि का बकरा चाहिए था, वह भारत ही मिला।

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