लुधियाना (अशोक सहगल) : आयुर्वेद के नाम पर बढ़ती कथित दुकानदारी अब गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। प्राचीन और वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति के रूप में प्रतिष्ठित आयुर्वेद को कई स्थानों पर व्यावसायिक मुनाफे का माध्यम बनाए जाने के आरोप लग रहे हैं। कोई विशेष आहार से जटिल रोग ठीक करने का दावा कर रहा है तो कोई हर बीमारी के सौ प्रतिशत उपचार की गारंटी दे रहा है।
नाड़ी रोग विशेषज्ञ *डॉ. मदन लाल प्रभाकर* का कहना है कि आयुर्वेद के लिए यह चिंताजनक दौर है। उनका आरोप है कि सरकार और संबंधित विभाग पर्याप्त निगरानी नहीं कर रहे। उन्होंने कहा कि कई स्वयंभू वैद्य ऐसे भी सामने आ रहे हैं जिन्हें नाड़ी परीक्षण का समुचित ज्ञान तक नहीं है।
*चमत्कारी इलाज के दावों की भरमार*
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई स्वयंभू चिकित्सक सामने आए हैं जो आधुनिक चिकित्सा पद्धति की दवाओं के दुष्प्रभावों का भय दिखाकर आयुर्वेद से चमत्कारी उपचार का दावा करते हैं। सामाजिक माध्यमों, समाचार पत्रों और अन्य प्रचार माध्यमों के जरिए मोटापा, बाल झड़ना, गैस, कब्ज, हृदय, गुर्दा, यकृत और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं।
कुछ कथित चिकित्सक प्रतिदिन कुछ सौ रुपये की दवा लेकर कुछ महीनों में रोग समाप्त होने तक का दावा करते हैं, लेकिन ऐसे दावों के समर्थन में प्रमाणित शोध या चिकित्सकीय अध्ययन सार्वजनिक नहीं किए जाते।
*डिग्री और पंजीकरण की जांच की मांग*
लोगों का कहना है कि आयुष मंत्रालय और संबंधित विभागों को ऐसे चिकित्सकों की डिग्रियों, पंजीकरण, उपचार पद्धति और दवाओं की गहन जांच करनी चाहिए। आरोप है कि कुछ लोग बिना किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सकीय योग्यता के स्वयं को वैद्य या आयुर्वेद विशेषज्ञ बताते हैं और सरकारी मान्यता होने का दावा भी करते हैं।
*भय के सहारे दवाओं का कारोबार*
आरोप यह भी है कि कुछ कारोबारी आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभावों का डर दिखाकर अपनी महंगी दवाएं बेचते हैं। कई मरीजों का कहना है कि उन्होंने उपचार पर बड़ी रकम खर्च की, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिला। ऐसे मामलों की व्यवस्थित जांच और शिकायत व्यवस्था की मांग उठ रही है।
*‘हर्बल’ और ‘प्राकृतिक’ नाम पर महंगे उत्पाद*
साधारण जड़ी-बूटियों से बने उत्पादों को आकर्षक पैकिंग देकर ‘प्राकृतिक’, ‘जैविक’ और ‘विशेष’ उत्पाद के रूप में ऊंची कीमतों पर बेचे जाने की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्राकृतिक होने का दावा किसी उत्पाद को स्वतः सुरक्षित नहीं बनाता।
कुछ आयुर्वेदिक अथवा हर्बल बताकर बेचे जाने वाले उत्पादों में अवांछित तत्व, भारी धातुएं या अन्य औषधीय पदार्थ पाए जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। इसलिए दवाओं की गुणवत्ता की नियमित जांच आवश्यक मानी जाती है।
*बिना विवरण की पुड़िया और नंबर वाली दवाओं पर सवाल*
कई कथित चिकित्सकों द्वारा मरीजों को ऐसी पुड़िया, चूर्ण या दवाएं दिए जाने की शिकायत है जिन पर सामग्री, मात्रा, निर्माता अथवा औषधि का स्पष्ट विवरण नहीं होता। कहीं दवाओं को केवल नंबर देकर दिया जाता है तो कहीं उन्हें खानदानी नुस्खा बताकर भारी रकम वसूली जाती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि मरीज को आखिर पता कैसे चले कि वह कौन-सी औषधि और कितनी मात्रा में ले रहा है। संबंधित विभागों से ऐसे उत्पादों और उपचार केंद्रों के नियमित नमूने लेने की मांग की जा रही है।
*झोलाछाप और स्वयंभू वैद्यों की बढ़ती संख्या*
गली-मोहल्लों से लेकर सामाजिक माध्यमों तक ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती दिखाई दे रही है जो बिना *आयुर्वेद चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा स्नातक* अथवा *आयुर्वेद में स्नातकोत्तर चिकित्सा उपाधि* जैसी मान्य योग्यता के गंभीर रोगों का उपचार करने का दावा करते हैं।
इसके अलावा बिना चिकित्सकीय पृष्ठभूमि वाले लोग भी सामाजिक माध्यमों पर घरेलू नुस्खे और जड़ी-बूटियों के जरिए गंभीर बीमारियों का इलाज बताने लगे हैं। कई प्रचारों में प्रसिद्ध व्यक्तियों को साथ दिखाकर आम लोगों में भरोसा पैदा करने का प्रयास भी किया जाता है।
*‘प्राकृतिक है तो नुकसान नहीं’ की धारणा गलत*
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मानना गलत है कि आयुर्वेदिक दवा होने के कारण उसका कोई दुष्प्रभाव नहीं हो सकता। आयुर्वेद में भी औषधि की मात्रा, सेवन का समय, व्यक्ति की प्रकृति, आयु और रोग की स्थिति का ध्यान रखा जाता है। बिना योग्य चिकित्सक की सलाह के लंबे समय तक किसी औषधि का सेवन नुकसानदायक हो सकता है।
*असली आयुर्वेद और कथित दुकानदारी में अंतर*
वास्तविक आयुर्वेदिक उपचार में रोगी की प्रकृति, वात-पित्त-कफ, जीवनशैली, चिकित्सकीय इतिहास और आवश्यक परीक्षणों को ध्यान में रखा जाता है। योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के पास मान्यता प्राप्त संस्थान की डिग्री और संबंधित परिषद में पंजीकरण होना चाहिए।
इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति बिना जांच के हर मरीज को एक जैसी दवा दे, हर बीमारी के सौ प्रतिशत इलाज की गारंटी दे या बहुत कम समय में चमत्कारी परिणाम का दावा करे तो ऐसे दावों की सत्यता की जांच जरूरी है।
*कैसे करें बचाव*
मरीजों को किसी भी आयुर्वेदिक चिकित्सक से उपचार लेने से पहले उसकी *मान्यता प्राप्त डिग्री और पंजीकरण* अवश्य जांचना चाहिए। दवा खरीदते समय निर्माता, औषधि अनुज्ञापत्र, निर्माण तिथि, सामग्री और अन्य आवश्यक विवरण देखना चाहिए। इंटरनेट या किसी गैर-चिकित्सकीय व्यक्ति की सलाह पर स्वयं दवा शुरू करने से बचना चाहिए।
आयुर्वेद की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि *सरकार योग्य चिकित्सकों और बिना योग्यता इलाज करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करे तथा भ्रामक विज्ञापनों और अप्रमाणित उपचार दावों पर सख्त निगरानी रखे।*