
संघ के शताब्दी समारोह ने कई अहम मुद्दों पर दिया चौंकाने वाला बयान
आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दो दिन पहले यह साफ़ कर दिया कि उनका अपने पद से रिटायर होने का कोई इरादा नहीं है। संघ इस साल अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर रहा है। इसी मौक़े पर राजधानी दिल्ली में आयोजित तीन दिनों की ‘व्याख्यानमाला’ के आख़िरी दिन सवालों के जवाब देते भागवत ने यह अहम बात कही।
एक और सवाल पर उन्होंने कहा कि बीजेपी के साथ संघ का कोई झगड़ा नहीं, मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद नहीं है। हालांकि बीजेपी के बारे में उन्होंने कुछ ऐसा भी कहा, जिससे लगा कि वो पार्टी पर तंज़ कर रहे हैं।
फिलहाल उनका बयान सुर्खियों में है और मीडिया से लेकर तमाम विशलेक्षक इसके मतलब तलाश रहे हैं। एक और बड़ी भागवत ने की, वो काशी और मथुरा में मंदिर-मस्जिद विवादों से जुड़ी है। खैर, बीबीसी की खास रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया कि भागवत ने कुछ ही दिन पहले कहा था कि नेताओं को 75 साल की उम्र हो जाने पर अपना पद छोड़ देना चाहिए। तब ये सवाल भी उठा कि क्या भागवत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इशारे से कुछ कह रहे हैं, क्योंकि सितंबर के महीने में मोदी 75 साल के हो जाएंगे। बीजेपी में कई सालों से 75 साल की उम्र होने पर नेता चुनाव नहीं लड़ते या अपने पद को छोड़ देते हैं या उन्हें हटा दिया जाता है। वीरवार को इसी मुद्दे पर भागवत ने कहा कि 75 साल वाली बात उन्होंने मोरोपंत पिंगले के हवाले से कही थी। वो बड़े मज़ाकिया आदमी थे। एक कार्यक्रम में पूरे भारत से कार्यकर्ता मौजूद थे, उन्होंने 70 वर्ष पूरे किए थे। हमारे सरकार्यवाह शेषाद्री जी ने उन्हें एक शॉल भेंट की और कुछ बोलने के लिए कहा। तब पिंगले ने कहा कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, यह शॉल भी ज़रूरी नहीं है। फिर बोले, आपको लगेगा मेरा सम्मान किया है। हालांकि मैं जानता हूं कि जब किसी को शॉल दी जाती है, तो मतलब होता है कि अब आपकी उम्र हो गई है। आप आराम से कुर्सी पर बैठकर देखिए आगे क्या होता।
मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी उम्र 75 साल हो गई है, अब मैं रिटायरमेंट का आनंद लेना चाहता हूं। अगर मेरी उम्र 35 साल है तो भी संघ कह सकता है कि तुम कार्यालय में बैठो। हम वही करते हैं जो संघ हमें कहता है।
अब माहिर समीक्षा कर रहे हैं कि क्या आरएसएस प्रमुख अपनी बात से पलट गए हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर यू-टर्न ले लिया है ? वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं 75 साल पर रिटायरमेंट की बात एक जुमला था। अब जो हुआ है, वो यू-टर्न नहीं बल्कि सुविधानुसार अपनी बात को बदल लेने जैसा है। ये भी एक तरीक़े से ख़ुद को ग़ैर-राजनीतिक कहकर सियासी बातें करते हैं। चाहे वो आरक्षण, हिंदू राष्ट्र या 75 साल के रिटायरमेंट की बात हो। कभी ‘अच्छे दिन’ आते हैं, कभी आप कह देते हैं कि 15-15 लाख रुपये आपके खाते में जाएंगे
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी आरएसएस और बीजेपी पर क़रीबी नज़र रखते हैं। उनके मुताबिक़ सितंबर में ख़ुद भागवत 75 साल के हो रहे हैं और मोदी भी। अब बीजेपी और संघ में कोई नियम तो लिखा हुआ नहीं। संघ में तो सरसंघचालक होते हैं, वो आजीवन होते हैं या वो रिटायर होना चाहें तो वो अपने हिसाब से हो सकते हैं। संघ का शताब्दी वर्ष है तो कोई भी यह उम्मीद नहीं कर रहा कि भागवत अपने पद से अभी रिटायर होंगे, कम से कम एक साल तो शताब्दी वर्ष ही चल रहा है। साथ ही कहा कि इस पूरी चर्चा में नरेंद्र मोदी एक अपवाद हैं। उनके भरोसे ही पूरी पार्टी व सरकार चल रही है तो वो तो अपवाद भी होंगे, उनको बदलना और मार्केटिंग सेंस में भी समझदारी नहीं लगती।
पिछले लोकसभा चुनाव के बीच ही बीजेपी नेता जेपी नड्डा के उस बयान से भी खलबली मच गई थी, जिसमें उन्होंने बीजेपी के सक्षम होने और उसे आरएसएस की ज़रूरत ना होने की बात कही थी। हालांकि नड्डा के बयान को संघ ने इ एक ‘पारिवारिक मामला’ बता कहा था कि संघ ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं करता।
भागवत ने यह भी कहा, हिंदू मानस में काशी, मथुरा, अयोध्या तीनों का महत्व है। दो जन्मभूमि हैं, एक निवास स्थान है तो हिंदू समाज इसका आग्रह करेगा। संस्कृति और समाज के हिसाब से संघ इस आंदोलन में नहीं जाएगा, लेकिन संघ के स्वयंसेवक जा सकते हैं, वो हिंदू हैं। ये तो मैसेज है ही साफ़- हैं, भागवत कहना चाह रहे हैं कि मुझ पर हिंदू संगठन के अध्यक्ष होने या लीडर होने के बाद दबाव बना हु है और यह सच है कि उन पर स्वयंसेवकों का दबाव है। मुस्लिम समाज के लिए तो वो कह ही रहे हैं, इसमें तो कोई कंफ्यूजन नहीं है कि आप इस पर झगड़ा मत करो ये दोनों धार्मिक स्थल भी हिंदुओं को दे दो।