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मुद्दे की बात : केजरीवाल के इस्तीफे के सियासी मायने

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बीजेपी दिल्ली सीएम के इस्तीफे की टाइमिंग से क्यों बेचैन ?

फिलहाल कानून-शिकंजे में फंसे आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सीएम पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर सियासी-हलचल पैदा कर दी। उनके इस ऐलान के बाद रविवार से ही हर किसी के जहन में यही सवाल है कि आखिर इसके राजनीतिक-मायने क्या हैं ? यहां गौरतलब है कि उन्होंने यह ऐलान कोई सोशल मीडिया के जरिए नहीं किया। बाकायदा आम आदमी पार्टी के हैडक्वार्टर में पार्टी के नेताओं-वर्करों के बीच किया। साथ ही साफ कहा कि वह दो दिन में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने एक और हैरान कर देने वाला ऐलान करते कहा कि पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, जो एक महीने पहले जेल से रिहा हुए थे, उनके उत्तराधिकारी नहीं होंगे। इतना ही नहीं, इस्तीफे के ऐलान के बाद केजरीवाल ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के साथ ही नवंबर में दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव कराने की मांग रख दी।

यहां काबिलेजिक्र है कि देश की राजनीति में अलग पहचान बनाने वाले केजरीवाल जब, जो बयान देते हैं, उसके गहरे राजनीतिक-अर्थ भी निकाले जाते हैं। अब उन्होंने कहा कि वह दिल्ली और महाराष्ट्र, दोनों जगह जनादेश मांगेंगे और आबकारी नीति मामले में अपनी बेगुनाही साबित करेंगे। यहां बताते चलें कि केजरीवाल इसी मामले में करीब छह महीने जेल में रहने के बाद शुक्रवार को तिहाड़ जेल से बाहर आए। फिर ठीक दो दिन बाद इस्तीफे का ऐलान कर दिया। ऐसे में दिल्ली सीएम केजरीवाल का इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला दिल्ली की चुनी हुई सरकार पर लगाए गए दोहरे प्रतिबंधों के नतीजे के रूप में भी देखा जा रहा है। एक तो संशोधित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार यानि जीएनसीटीडी अधिनियम द्वारा लगाए प्रतिबंध, जो उपराज्यपाल को और अधिक अधिकार देता है, ख़ासतौर पर नौकरशाही पर। जबकि दूसरा, केजरीवाल पर लगाई गई जमानत की शर्तें, जिसके अनुसार वह दिल्ली सचिवालय और अपने दफ़्तर नहीं जा सकते और सिर्फ़ उन्हीं दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, जिन्हें उपराज्यपाल द्वारा स्वीकृत या मंज़ूरी दी जानी है। केजरीवाल के लिए यह एक मजबूरी की तरह है।

सियासी जानकारों की नजर में, ऐसे में उनके पास इस्तीफा के अलावा कोई और विकल्प बचा नहीं था। आप नेता भी मान रहे हैं कि  जमानत मिलने के बाद इस्तीफा देना महत्वपूर्ण था, उससे पहले नहीं। दरअसल पहले ऐसा करना उनकी सियासी-कमज़ोरी माना जाता। अब, सीएम बाहर हैं और अपनी भूमिका में बने रह सकते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी इच्छा से ऐसा करने का फैसला किया है, ना कि किसी बाहरी दबाव में। पार्टी कार्यकर्ता मैदान में हैं। यह भी सच है कि आप पर बार-बार होने वाले हमलों ने पार्टी को कमज़ोर स्थिति में ला दिया है। अब वरिष्ठ नेता उन अफ़वाहों को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जो उनके दूर रहने के दौरान फैलाई गई थीं। साथ ही मतदाताओं से फिर से जुड़ने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। जाहिर है कि केजरीवाल के इस्तीफे का ऐलान होते ही सबसे ज्यादा भाजपा में बेचैनी बढ़ी है।

सियासी जानकारों की मानें तो केजरीवाल की इस घोषणा ने भाजपा को चौंका दिया। माना जा रहा था कि बीजेपी, आगे भी आम आदमी पार्टी और उसके वरिष्ठ नेतृत्व, खासतौर पर केजरीवाल पर हमले को और तेज करने की कोशिश कर रही थी। भाजपा वैसे भी दिल्ली चुनाव की तैयारी के शुरुआती चरण में है। बीजेपी की बेचैनी के संकेत पार्टी के दिल्ली सचिव हरीश खुराना के बयान से मिले। उन्होंने सवाल उठाते आरोप लगाया कि केजरीवाल ने इस्तीफा देने के लिए दो दिन का समय क्यों मांगा। ऐसा लगता है कि यह एक नया नाटक रचने की कोशिश है। वह कहना चाहते हैं कि देखो, मैं इस्तीफा देना चाहता हूं, लेकिन लोग नहीं चाहते कि मैं इस्तीफा दूं। कुल मिलाकर केजरीवाल ने इस्तीफे की घोषणा कर अपने साथ ही आम आदमी पार्टी को भी एक बार फिर चर्चा में ला दिया। केजरीवाल पिछले 12 साल में अपने राजनीतिक करियर में उतार-चढ़ाव के दौरान ऐसे चौंकाने वाले कदम उठाते रहे हैं। यह भी गौरतलब पहलू है कि राजनीति में आने से पहले अरविंद केजरीवाल इंडियन रेवेन्यू सर्विस यानि आयकर विभाग में काम करते थे। लिहाजा खुद पर कसे कानूनी-शिकंजे में ब्यूरोक्रेसी की भूमिका से वह बखूबी वाकिफ हैं। इसलिए कानूनी-नजरिए से हालात को समझते हुए भी वह नामचारे के सीएम बनकर दोगुनी बदनामी मोल नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने अपने इस्तीफे को ‘कुर्बानी’ देने वाले अंदाज में सियासी-तौर पर भुनाना ज्यादा मुनासिब समझा, ऐसा जानकारों का मानना है।

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