47 साल पहले ग्राम पंचायत ने नगर निगम को हैंड ओवर की थी जमीन, आईएमपी रजिस्टर में सरकार के नाम पर दर्ज है रिकॉर्ड

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ताजपुर रोड पर सेंट्रल जेल के पास 32 एकड़ जमीन पर कब्जे का मामला

लुधियाना 22 फरवरी। ताजपुर रोड पर सेंट्रल जेल के पास मौजूद 32 एकड़ बेशकीमती जमीन के असली मालिक को लेकर सस्पेंस बरकरार है। दो पक्षों द्वारा खुद को जमीन के मालिक बताया जाता है। जबकि नगर निगम पहले खुद इसे अपनी जमीन बताकर कब्जा भी ले चुका है। शुक्रवार को दो पक्षों में हुए विवाद के मामले में पुलिस द्वारा कार्रवाई भी कर दी गई है। जिसके चलते थाना डिवीजन नंबर सात की पुलिस ने बलविंदर सिंह की शिकायत पर एमआईजी फ्लैट के परविंदर सिंह बाजवा, जीवन सिंह नगर के हरप्रीत सिंह, परविंदर के भाई व तीन ड्राइवरों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। लेकन हैरानी की बात तो यह है कि इस जमीन को लेकर कई लोग खुद को दावेदार बताते है, लेकिन असलियत में मालिक कौन है, यह पता नहीं चल सका है। ग्रेवाल फार्म वालों द्वारा भी जगह जगह बोर्ड लगाकर इस 600 करोड की जमीन के खुद को मालिक बताया जाता है, जबकि दूसरे पक्ष द्वारा भी खुद को मालिक बताते हुए ग्रेवाल द्वारा अ‌वैध कब्जा करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन लोगों में चर्चा है कि यह जमीन नगर निगम की है। अब देखना होगा कि आखिर इस जमीन का असली मालिक कौन साबित होता है।

ग्राम पंचायत की थी जमीन
जानकारी के अनुसार यह 32 एकड़ जमीन पहले ग्राम पंचायत की थी। लेकिन 1978 में नगर पालिका (नगर निगम) बनी। जिसके बाद यह सारी जमीन नगर निगम को ट्रांसफर कर दी गई। यह जमीनें शहर में आने के चलते ऑटोमेटिक ही निगम के अधीन आ गई। उस समय लुधियाना के डीसी अरूण गोयल और नगर निगम कमिश्नर मिस्टर संधू होते थे। तब जितनी भी प्रॉपर्टी ट्रांसफर हुई, वह इन अधिकारियों की ही देखरेख में की गई थी। इस दौरान रिकॉर्ड रखने के लिए एक आईएमपी रजिस्टर रखा गया था। जिसमें सारी अचल संपत्ति का डाला रखा गया था। इन्हीं सभी प्रॉपर्टियों का रिकॉर्ड रेवेन्यू रिकॉर्ड में रखा गया था।

निगम ने लिया था जमीन पर कब्जा
जानकारी के अनुसार जिस जमीन के पीछे दो पक्ष आपस में झगड़ा कर रहे हैं, दरअसल, नगर निगम खुद इसका ऑन रिकॉर्ड कब्जा ले चुकी है। यह कब्जा 1978 से लेकर 1980 तक निगम द्वारा लिया गया थआ। तब इसका रिकॉर्ड रजिस्टर जोन-बी द्वारा बनाया गया था, लेकिन अब यह रजिस्टर जोन-सी में पड़ा है।

जमाबंदी को तोड़कर रिकॉर्ड से की छेड़छाड़
जानकारी के अनुसार 1980 से 1982 में कुछ शरारती लोगों द्वारा रिकॉर्ड से छेड़छाड़ करके जमाबंदी को तोड़ दिया। जिसके बाद रेवेन्यू रिकॉर्ड में हेरफेर करके इस जमीन को प्राइवेट बना दिया। जबकि इसे प्राइवेट बनाने के लिए कोई खास तर्क भी नहीं दिया गया।

शरारती तत्व व पुलिस अधिकारी भी शामिल
चर्चा है कि इस प्रॉपर्टी को हड़पने के लिए कई शरारती तत्व व पुलिस अधिकारियों का पूरा गैंग शामिल है। जिनका काम ही अ‌ैध प्ऱॉपर्टियों पर कब्जा करना है। चर्चा है कि एक रिटायर्ड आईजी व उनके गैंग द्वारा इस तरह प्रॉपर्टियों पर कब्जे किए है। इस गैंग में मंत्री से लेकर संत्री तक शामिल है। चर्चा है कि इस गैंग में सभी के हिस्से पहले से ही निर्धारित होते हैं। जिसका जितना ज्यादा काम होता है, उसका उतना ही ज्यादा बड़ा हिस्सा रखा जाता है।

कांग्रेस सरकार के समय धीरे धीरे कर किया कब्जा
चर्चा है कि कांग्रेस सरकार के समय 2020-21 के दौरान कब्जाधियों द्वारा बड़े शातिर तरीके से जमीन पर कब्जा किया था। जिसमें पहले तो धीरे धीरे करके एक एक ईट लगाई गई, जिसके बाद इसी तरह कुछ कछ समय बाद ईटें लगाकर चारदीवारी कर दी गई। बेशक दस्तावेजों में हेरफेर करके जमीन अपने नाम करवा ली गई थी, लेकिन प्रैक्टिक्ल तौर पर कांग्रेस कार्यकाल के दौरान लिया गया। उस समय मंत्री, विधायक, विरोधी पार्टियों और पुलिस के बीच काफी बहस हुई।

निगम अधिकारी भी जानते थे पूरी हकीकत
जानकारी के अनुसार पहले नगर निगम कमिश्नर के. बराड़ की और से मामले की गहनता से जांच की गई। इस दौरान पूर्व सीनियर अधिकारी बीके गुप्ता और डीपी जैन को बुलाकर कमिश्नर ने मामले की हकीकत जानी थी। जिसके बाद उन्होंने बताया था कि यह जमीन सरकारी है। हालांकि इसी तरह उक्त 32 किले के साथ लगती भोला कॉलोनी की जमीन भी सरकारी है। जिस पर करीब 202 लोग अ‌वैध तरीके से कब्जे करके रह रहे हैं। आईएमपी रजिस्टर में उन लोगों की डिटेल भी शामिल है।

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