भ्र्ष्टाचार मामले में बीआईएस से लेकर सरकारी टेंडरों तक अधिकारीयों की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल !
लुधियाना 30 नवंबर। कई बार यूसीपीएमए के प्रधान रह चुके डीएस चावला का साईकिल की गिरती क्वालिटी को लेकर खुलासे ने पूरी इंडस्ट्री में हड़कंप का माहौल कायम कर दिया है। इंडस्ट्री में बेबाक चावला के तर्क और जानकारी को चेलेंज करना आसान नहीं है इसीलिए उनके ब्यानं ने बीआईएस से लेकर जीएसटी विभाग के अधिकारीयों की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए है। उधर सबसे बड़ा सवाल सरकारी टेंडरों में सप्लाई हो रहे साइकिलों की क्वालिटी पर लग गया है। क्योकि ये साईकिल विभिन्न राज्य सरकारों के टेंडरों में दी गई शर्तों के हिसाब से सप्लाई होते है। ऐसे में पूर्व प्रधान चावला का ऐसा कहना की बाजार में बिक रहे एवं टेंडरों में सप्लाई हो रहे रोडस्टर साईकिल की क्वालिटी को टेंडर की शर्तों अनुसार चैक करने से दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा पर लोग लगातार मंथन कर रहे है।

जिंदल ने भी किया था खुलासा
गौरतलब है की सबसे पहले इंडस्ट्री एंड ट्रेड फोरम के प्रवक्ता बदीश जिंदल ने अधिकारीयों के इस भ्र्ष्टाचार का खुलासा किया था। जब एक ही क्वालिटी और स्टेंडर्ड का साईकिल दो अलग अलग राज्य सरकारों में 2500 और 4500 रु की अलग अलग कीमतों के सप्लाई किया गया था। 
हलके में नहीं लिया जा सकता चावला का बयान
गौरतलब है की पूर्व प्रधान चावला लम्बे समय से साईकिल इंडस्ट्री में एक बड़े नेता की पहचान रखते है और इंडस्ट्री के पक्ष में राज्य से लेकर केंद्र तक कई लड़ाईं एवं मुद्दे हल करवा चुके इसलिए इंडस्ट्री की ऐसी कोई बात नहीं जिसकी सच्चाई से वाकिफ नहीं हो। इसलिए उनके बयान को हलके में नहीं लिया जा सकता है। इसलिए टेंडरों में साईकिलों की क्वालिटी पर खड़े सवाल के पीछे क्या राज है पूरी इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बना हुआ है।
2200 की साईकिल टेंडरों में हो रही 4500 में सप्लाई।
विशेषज्ञों में चर्चा की सरकारी टेंडरों में 4500 से 4900 रु सप्लाई होने वाला रोडस्टर साईकिल खुदरा बाजार में 2200 रु तक मिल जाती है फिर टेंडर मे ऐसी कौन सी शर्ते लगाई जाती है की साईकिल की कीमते दो गुना तक बढ़ जाती है। हर साल विभिन्न सरकारों के टेंडरों में लगभग 50 लाख साईकिल टेंडरों में सप्लाई हो रहे है।
बड़ी कंपनियां क्यों कर रही किनारा ?
पूर्व प्रधान चावला के बयान के बाद से बाजार में चर्चा है की साईकिल टेंडरों में बड़े स्तर पर रिश्वतखोरी का खेल चल रहा है टेंडरों में राज्यों के सीएम ऑफिस के अधिकारियो तक की मिली भगत बताई जाती है जिसके आधार पर भ्र्ष्टाचार के खेल को बड़ा करते हुए प्रति साईकिल 400 रु से 900 रु तक रिश्वत ली जाती है। बड़े खेल की एवज में कंपनियों को भी पूरी सहूलियत मिलती है जिसमें टेंडर को मैनेज करते हुए अलाट मैंट तक की जिम्मेवारी रहती है चुनिंदा कम्पनिया आपस में पुल कर टेंडर डालती है यही नहीं टेंडर की शर्तें भी उनकी योग्यता अनुसार डिजाइन किया जाता है अधिकारीयों द्वारा कंपनियों को डोर स्टैप तक सर्विस देते हुए सारी रिश्वत टेंडर आर्डर अलाट होने के साथ ही ले ली जाती है। शायद यही कारण है की इसी लिए देश की नामी कंपनियां अब टेंडर कारोबार से किनारा करती जा रही है।
